जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक परिचय | Jaishankar Prasad Ka Sahityik Parichay

जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक परिचय ( Jaishankar Prasad Ka Sahityik Parichay ) देने के लिए छोटे – छोटे अनेक पहलुओं पर प्रकाश डालना होगा। इन तथ्यों को एक साथ मिलाकर हम समझ पाएंगे कि जयशंकर प्रसाद जी का हिंदी साहित्य से क्या सम्बन्ध रहा है।

 

जयशंकर प्रसाद जी का जीवन परिचय :-
जयशंकर प्रसाद जी का जन्म काशी ( बनारस ) के प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था। इनका जन्म 30 जनवरी 1889 में हुआ था। जयशंकर प्रसाद जी के पिता का नाम बाबू देवीप्रसाद तथा माता का नाम मुन्नी देवी था। उनके पिता जी एक व्यापारी थे।

 

जयशंकर प्रसाद जी का मृत्यु 1937 में हो गई। प्रसाद जी का जीवन सिर्फ 48 वर्ष का रहा है।

 

जयशंकर प्रसाद जी का शिक्षा :-
जयशंकर प्रसाद जी काशी के क्वींस कॉलेज में अपना नाम लिखवाए थे। उन्होंने वहां छठी में नाम लिखवाया और 7वीं तक ही शिक्षा ग्रहण किए।

 

उनके पिता जी के मृत्यु के कुछ ही समय बाद उनकी माता की भी मृत्यु हो गई।  जिसके कारण उनकी शिक्षा घर पर ही हुई। उन्होंने घर पर ही रहकर हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी तथा फारसी का अध्ययन किया।

 

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जयशंकर प्रसाद का साहित्य में स्थान :-

जयशंकर प्रसाद जी अपनी लेखनी के माध्यम से नाटक, कविता, कहानी, निबंध और उपन्यास को लिखकर दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी भाषा को समृद्ध करके एक नए आयाम तक पहुंचाया।

 

वे अपनी कविताओं में सौंदर्य का सूक्ष्म चित्रण करते थे। प्रकृति से प्रेम और देश से प्रेम उनकी कविताओं की मुख्य विशेषताएं थी। उनका इतिहास और दर्शन के प्रति रुचि उनके साहित्य में झलकता है।

 

जयशंकर प्रसाद जी को हिंदी युग के कवि माने जाते थे। जयशंकर प्रसाद अपने जीवन में संघर्ष करके अनेक रचनाओं को लिखे थे। उनकी ‘कामायनी’ रचना आज के वर्तमान समय में सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है।

जयशंकर प्रसाद जी को ‘कामायनी’ रचना के लिए मंगलाप्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया था।  जयशंकर प्रसाद जी उपन्यास को ऐसे लिखते थे कि जैसे उन्हें उपन्यास से काफी लगाव था।

 

वे उपन्यास को सरल और सुव्यवस्थित ढंग से लिखते थे। जो भी लोग उनके उपन्यास को पढ़ते थे उन्हें बार – बार पढ़ने की इच्छा होती थी।

 

जयशंकर प्रसाद जी को काव्य रचना, नाटक और साहित्य के प्रति रुचि थी। उनकी शैली भावात्मक एवं चित्रात्मक थी। उन्होंने अपनी पहली काव्य ‘चित्राधार ’ब्रजभाषा और खड़ीबोली में लिखी थी।

 

जयशंकर प्रसाद जी को छायावाद का प्रवर्तक माना जाता है। जयशंकर प्रसाद जी को ‘प्रसाद युग’ का  निर्माणकर्ता कहा जाता है। जयशंकर प्रसाद की पहली रचना ‘चित्राधार’ था।

 

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित पहला नाटक राजश्री था। जयशंकर प्रसाद सिर्फ गद्य ही नहीं बल्कि काव्य भी लिखते थे। उनकी काव्य रचना ब्रजभाषा खड़ी बोली में लिखी गई थी। उन्होंने अपनी रचनाओं से हिंदी को समृद्ध किया।

 

वैसे तो जयशंकर प्रसाद जी कवि के रूप में दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं लेकिन वे सिर्फ कवि ही नहीं बल्कि नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार और निबंधकार भी थे। इरावती उनके असमय मृत्यु के कारण अधूरा रह गया। कामायनी जयशंकर प्रसाद जी का अंतिम काव्य तथा ध्रुवस्वामिनी अंतिम नाटक था।

 

जयशंकर प्रसाद की पहली रचना कौन सी है ?

जयशंकर प्रसाद अपने जीवन में अनेक कविता, कहानी, नाटक, निबंध और उपन्यास लिखे। उन सभी रचनाओं में से प्रारंभिक कविताओं का संग्रह ‘चित्राधार’ था। चित्राधार का दो संस्करण आया था। इसका पहला प्रकाशन 1918 में किया गया था और दूसरा 1928 में किया गया था। इस कविता का पहला संस्करण ब्रजभाषा और खड़ीबोली दोनों में ही किया गया था।

 

जयशंकर प्रसाद की सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है ?

जयशंकर प्रसाद जी के द्वारा लिखा गया सर्वश्रेष्ठ रचना ‘कामायनी’ है जो हिंदी भाषा का एक महाकाव्य है। कामायनी आज के वर्तमान समय का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य मानी जाती है। यह उनकी अंतिम महाकाव्य कृति थी जिसका प्रकाशन 1936 में किया गया था।

 

कामायनी छायावाद युग की सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य मानी जाती है। इसे रामचरित मानस के बाद दूसरा सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है। इस महाकाव्य में मनु और श्रद्धा के माध्यम से मानव जीवन के संपूर्ण परिवेश के बारे में बताया गया है।

 

जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएँ :-

उनकी प्रमुख काव्य – चित्राधार, कानन-कुसुम, झरना, आंसू, लहर और कामायनी

उनके प्रमुख नाटक – अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त, और ध्रुवस्वामिनी

उनके प्रमुख उपन्यास – कंकाल, तितली, और इरावती

उनके प्रमुख कहानी संग्रह – आकाशदीप, आंधी और इंद्रजाल

 

Ques – जयशंकर प्रसाद की कुल कितनी रचनाएं हैं ?

Ans – 67

 

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निष्कर्ष – जयशंकर प्रसाद जी का जीवन काल काफी छोटा रहा है। वे कम समय में ही हिन्दी भाषा को एक नए मुकाम तक पहुंचाया है। जिसे लोग आज भी पढ़ते हैं और आगे भी पढ़ते ही रहेंगे।

 

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